स्वतंत्रता संग्राम की भारतीय वीरांगनाएं

स्वतंत्रता संग्राम की भारतीय वीरांगनाएं

क्रांतिकी शक्ति सिर्फ पुरुषों को ही आकृष्ट नहीं करतीहै बल्कि महिलाओं को भी वैसे ही आकृष्ट करती आ रही है, इसीलिएहर युग के इतिहास में महिलाओं की शौर्य-गाथाओं का प्रमुखता सेवर्णन मिलता है। भारत में सदैव नारी को श्रद्धा की देवी मानागया है, जब अवसर आया तो इसी नारी ने चंडी का भी रूप धरा औरअपनी अदम्य शक्ति का लोहा मनवाया। यूं तो स्त्रियों की दुनियाघर के भीतर मानी जाती है, शासन-सूत्र का सहज स्वामी भी पुरूषही है। शासन और समर से स्त्रियों का सरोकार नहींजैसी तमामपुरूषवादी धारणाओं और स्थापनाओं को ध्वस्त करती उन भारतीयवीरांगनाओं का जिक्र किए बिना 1857 से 1947 तक की स्वाधीनता कीदास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवादिए। इन वीरांगनाओं में से अधिकतर की सबसे बड़ी विशेषता यह थीकि वे किसी रजवाड़े में पैदा नहीं हुईं बल्कि आम आदमी के घरजन्म लेकर, अपनी योग्यता की बदौलत उच्चतर मुकाम तक पहुंचीं।
भारतमें 1857 की क्रांति की अनुगूंज में दो वीरांगनाओं का नामप्रमुखता से लिया जाता है-लखनऊ और झांसी में क्रांति कानेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल और रानी लक्ष्मीबाई। ऐसा नहींहै कि 1857 से पूर्व भारतीय वीरांगनाओं ने स्वतंत्रता आंदोलनमें अपना जौहर नहीं दिखाया। सन् 1824 में कित्तूर (कर्नाटक) कीरानी चेनम्मा ने अंग्रेजों को मार भगाने के लिए फिरंगियों भारतछोड़ोबिगुल बजाया था। उसने रणचण्डी का रूप धर कर अपने अदम्यसाहस व फौलादी संकल्प की बदौलत अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दियेथे। कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास करनाचाहती थीं पर उनकी यह चाह पूरी न हो सकी। क्या संयोग था किरानी चेनम्मा की मौत के 6 साल बाद काशी में ही लक्ष्मीबाई काजन्म हुआ। हां! इतिहास के पन्नों में अंग्रेजों से लोहा लेनेवाली प्रथम वीरांगना रानी चेनम्मा ही मानी जाती है।
यहभी कम ही लोगों को पता होगा कि बैरकपुर में मंगल पाण्डे कोचर्बी वाले कारतूसों के बारे में सर्वप्रथम मातादीन ने बतायाऔर मातादीन को इसकी जानकारी उसकी पत्नी लज्जो ने दी। लज्जोअंग्रेज अफसरों के यहां काम करती थी, जहां उसे यह सुराग मिलाकि अंग्रेज गाय की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने जा रहेहैं। इसी प्रकार 9 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह करने पर 85 भारतीय सिपाहियों को हथकड़ी-बेड़ियां पहनाकर जेल भेज दिया गया औरअन्य सिपाही उस शाम को घूमने निकले तो मेरठ शहर की स्त्रियोंने उन पर ताने कसे। मुरादाबाद के तत्कालीन जिला जज जेसी विल्सनने इस घटना का वर्णन करते हुये लिखा है कि-'महिलाओं ने कहाकि-छिः! तुम्हारे भाई जेल खाने में और तुम यहां बाजार मेंमक्खियां मार रहे हो? तुम्हारे ऐसे जीने पर धिक्कार है।' इतनासुनते ही सिपाही जोश में आ गये और अगले ही दिन 10 मई कोजेलखाना तोड़कर उनहोंने सभी कैदी सिपाहियों को छुड़ा लिया और उसीरात्रि क्रांति का बिगुल बजाते हुए दिल्ली की ओर प्रस्थान करगये, जहां से 1857 की क्रांति की ज्वाला चारों दिशाओं में फैलगई।
लखनऊमें 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया।अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाकर उन्होंनेअंग्रेजी सेना का स्वयं मुकाबला किया। उनमें संगठन कीअभूतपूर्व क्षमता थी और इसी कारण अवध के जमींदार, किसान औरसैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे। आलमबाग की लड़ाई के दौरानअपने जांबाज सिपाहियों की उन्होंने भरपूर हौसला आफजाई की औरहाथी पर सवार होकर अपने सैनिकों के साथ दिन-रात युद्ध करतीरहीं। लखनऊ में पराजय के बाद वह अवध के देहातों मे चली गईं औरवहां भी क्रांति की चिंगारी सुलगाई। घुड़सवारी और तलवार चलानेमें माहिर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और शौर्य केकिस्से तो जन-जन में सुने जा सकते हैं। नवम्बर 1835 को बनारसमें मोरोपंत तांबे के घर जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन नाना साहबके साथ कानपुर के बिठूर में बीता। सन् 1855 में पति राजागंगाधर राव की मौत के पश्चात् उन्होंने झांसी का शासन संभालापर अंग्रेजों ने उन्हें और उनके दत्तक पुत्र को शासक मानने सेइन्कार कर दिया। लक्ष्मीबाई ने झांसी में ब्रिटिश सेना को कड़ीटक्कर दी और बाद में तात्या टोपे की मदद से ग्वालियर पर भीकब्जा किया। उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा था कि- 'यहां वहऔरत सोयी हुयी है, जो व्रिदोहियों में एकमात्र मर्द थी।'
मुगल सम्राट बहादुर शाह जफरकी बेगम जीनत महल ने दिल्ली औरआसपास के क्षेत्रों में स्वातंत्र्य योद्धाओं को संगठित कियाऔर देश प्रेम का परिचय दिया। सन् 1857 की क्रांति मेंबहादुरशाह जफर को प्रोत्साहित करने वाली बेगम जीनत महल नेललकारते हुए कहा था कि- 'यह समय गजलें कह कर दिल बहलाने कानहीं है, बिठूर से नाना साहब का पैगाम लेकर देशभक्त सैनिक आएहैं, आज सारे हिन्दुस्तान की आँखें दिल्ली की ओर व आप पर लगीहैं, खानदान-ए-मुगलिया का खून हिन्द को गुलाम होने देगा तोइतिहास उसे कभी क्षमा नहीं करेगा।' बाद में बेगम जीनत महल भीबहादुरशाह जफर के साथ ही बर्मा चली गयीं। इसी प्रकार दिल्ली केशहजादे फिरोजशाह की बेगम तुकलाई सुलतान जमानी बेगम को जबदिल्ली में क्रांति की सूचना मिली तो उन्होंने ऐशोआराम का जीवनजीने की बजाय युद्ध शिविरों में रहना पसंद किया और वहीं सेसैनिकों को रसद पहुंचाने और घायल सैनिकों की सेवा का प्रबन्धअपने हाथो में ले लिया। अंग्रेजी हुकूमत इनसे इतनी भयभीत होगयी थी कि कालान्तर में उन्हें घर में नजरबन्द कर उन पर बम्बईन छोड़ने और दिल्ली प्रवेश करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
बेगम हजरत महलऔर रानी लक्ष्मीबाई के सैनिक दल में तमाममहिलायें शामिल थीं। लखनऊ में बेगम हजरत महल की महिला सैनिक दलका नेतृत्व रहीमी के हाथों में था, जिसने फौजी भेष अपनाकर तमाममहिलाओं को तोप और बन्दूक चलाना सिखाया। रहीमी की अगुवाई मेंइन महिलाओं ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया। लखनऊ की तवायफहैदरीबाई के यहां तमाम अंग्रेज अफसर आते थे और कई बारक्रांतिकारियों के खिलाफ योजनाओं पर बात किया करते थे।हैदरीबाई ने पेशे से परे अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुये इनमहत्वपूर्ण सूचनाओं को क्रांतिकारियों तक पहुंचाया और बाद मेंवह भी रहीमी के सैनिक दल में शामिल हो गयी।
ऐसीही एक वीरांगना ऊदा देवी थीं, जिनके पति चिनहट की लड़ाई मेंवीरगति को प्राप्त हुए। ऐसा माना जाता है कि डब्ल्यू गार्डनअलक्जेंडर एवं तत्पश्चात क्रिस्टोफर हिबर्ट ने अपनी पुस्तक ग्रेट म्यूटिनीमें लखनऊ में सिकन्दरबाग किले पर हमले केदौरान जिस वीरांगना के अदम्य साहस का वर्णन किया है, वह ऊदादेवी ही थीं। ऊदा देवी ने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर लगभग 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। अंग्रेज असमंजस में पड़ गये औरजब हलचल होने पर कैप्टन वेल्स ने पेड़ पर गोली चलायी तो ऊपर सेएक मानवाकृति गिरी। नीचे गिरने से उसकी लाल जैकेट का ऊपरीहिस्सा खुल गया, जिससे पता चला कि वह महिला है। उस महिला कासाहस देख कैप्टन वेल्स की आंखे नम हो गयीं, तब उसने कहा कि यदिमुझे पता होता कि यह महिला है तो मैं कभी गोली नहीं चलाता। ऊदादेवी का जिक्र अमृतलाल नागर ने अपनी कृति गदर के फूलमेंबकायदा किया है। इसी तरह की एक वीरांगना आशा देवी थीं, जिन्होंने 8 मई 1857 को अंग्रेजी सेना का सामना करते हुयेशहादत पायी। आशा देवी का साथ देने वाली वीरांगनाओं में रनवीरीवाल्मीकि, शोभा देवी, वाल्मीकि महावीरी देवी, सहेजा वाल्मीकि, नामकौर, राजकौर, हबीबा गुर्जरी देवी, भगवानी देवी, भगवती देवी, इंदर कौर, कुशल देवी और रहीमी गुर्जरी इत्यादि शामिल थीं। येवीरांगनाएं अंग्रेजी सेना के साथ लड़ते हुये शहीद हो गयीं।
बेगम हजरत महलके बाद अवध के मुक्ति संग्राम में जिस दूसरीवीरांगना ने प्रमुखता से भाग लिया, वे थीं गोण्डा से 40 किलोमीटर दूर तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी देवी।राजेश्वरी देवी ने होपग्राण्ट के सैनिक दस्तों से जमकर मुकाबलालिया। अवध की बेगम आलिया ने भी अपने अद्भुत कारनामों सेअंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। बेगम आलिया 1857 के एक वर्षपूर्व से ही अपनी सेना में शामिल महिलाओं को शस्त्रकला मेंप्रशिक्षण देकर सम्भावित क्रांति की योजनाओं को मूर्त रूप देनेमें संलग्न हो गयी थीं। अपने महिला गुप्तचर के गुप्त भेदों केमाध्यम से बेगम आलिया ने समय-समय पर ब्रिटिश सैनिकों से युद्धकिया और कई बार अवध से उन्हें भगाया। इसी प्रकार अवध के सलोनजिले में सिमरपहा के तालुकदार वसंत सिंह बैस की पत्नी औरबाराबंकी के मिर्जापुर रियासत की रानी तलमुंद कोइर भी इससंग्राम में सक्रिय रहीं। अवध के सलोन जिले में भदरी कीतालुकदार ठकुराइन सन्नाथ कोइर ने विद्रोही नाजिम फजल अजीम कोअपने कुछ सैनिक और तोपें, तो मनियारपुर की सोगरा बीबी ने अपने 400 सैनिक और दो तोपें सुल्तानपुर के नाजिम और प्रमुख विद्रोहीनेता मेंहदी हसन को दी। इन सभी ने बिना इस बात की परवाह कियेहुये कि उनके इस सहयोग का अंजाम क्या होगा, क्रांतिकारियों कोपूरी सहायता दी।
झांसीकी रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की एक अलग टुकड़ी दुर्गादलबनायी हुई थी। इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी औरधनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में था। झलकारीबाईने कसम उठायी थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैंश्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊंगी। अंग्रेजों ने जबझांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ लड़ी। चूंकिउसका चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलता-जुलताथा, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई को घिरते देखा तो उन्हें महलसे बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं घायल सिहंनी की तरहअंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद हो गयीं। झलकारीबाई का जिक्रमराठी पुरोहित विष्णुराव गोडसे की कृति माझा प्रवासमें भीमिलता है। रानी लक्ष्मीबाई की सेना में जनाना फौजी इंचार्जमोतीबाई और रानी के साथ चौबीस घंटे छाया की तरह रहने वालीसुन्दर-मुन्दर और काशीबाई सहित जूही और दुर्गाबाई भी दुर्गा दलकी ही सैनिक थीं। इन सभी ने अपने जान की बाजी लगाकर रानीलक्ष्मीबाई पर आंच नहीं आने दी और अन्तोगत्वा वीरगति कोप्राप्त हुयीं।
कानपुर 1857 की क्रांति का प्रमुख गवाह रहा है। पेशे से तवायफअजीजनबाई ने यहां क्रांतिकारियों की संगत में 1857 की क्रांतिमें लौ जलायी। एक जून 1857 को जब कानपुर में नाना साहब केनेतृत्व में तात्याटोपे, अजीमुल्ला खान, बालासाहब, सूबेदारटीका सिंह और शमसुद्दीन खान क्रांति की योजना बना रहे थे तोउनके साथ उस बैठक में अजीजनबाई भी थीं। इन क्रांतिकारियों कीप्रेरणा से अजीजन ने मस्तानी टोली के नाम से 400 महिलाओं की एकटोली बनायी जो मर्दाना भेष में रहती थीं। एक तरफ ये अंग्रेजोंसे अपने हुस्न के दम पर राज उगलवातीं, वहीं नौजवानों कोक्रांति में भाग लेने के लिये प्रेरित करतीं। सतीचौरा घाट सेबचकर बीबीघर में रखी गईं 125 अंग्रेज महिलाओं और बच्चों कीरखवाली का कार्य अजीजनबाई की टोली के ही जिम्मे था। बिठूर केयुद्ध में पराजित होने पर नाना साहब और तात्याटोपे तो पलायन करगये लेकिन अजीजन पकड़ी गयी। युद्धबंदी के रूप में उसे जनरलहैवलॉक के समक्ष पेश किया गया। जनरल हैवलॉक उसके सौन्दर्य पररीझे हुए बिना न रह सका और प्रस्ताव रखा कि यदि वह अपनीगलतियों को स्वीकार कर क्षमा मांग ले तो उसे माफ कर दियाजायेगा। किंतु अजीजन ने एक वीरांगना की भांति उसका प्रस्तावठुकरा दिया और पलट कर कहा कि माफी तो अंग्रेजों को मांगनीचाहिए, जिन्होंने इतने जुल्म ढाये। इतने पर आग बबूला हो हैवलॉकने अजीजन को गोली मारने के आदेश दे दिये। क्षण भर में ही अजीजनका अंग-प्रत्यंग धरती माँ की गोद में सो गया। इतिहास में दर्जहै कि-'बगावत की सजा हंस कर सह ली अजीजन ने, लहू देकर वतन को।'
कानपुरके स्वाधीनता संग्राम में मस्तानीबाई की भूमिका भी कमनहीं है। बाजीराव पेशवा के लश्कर के साथ ही मस्तानीबाई बिठूरआई थी। अप्रतिम सौन्दर्य की मलिका मस्तानीबाई अंग्रेजों कामनोरंजन करने के बहाने उनसे खुफिया जानकारी हासिल कर पेशवा कोदेती थी। नाना साहब की मुंहबोली बेटी मैनावती भी देशभक्ति सेभरपूर थी। नाना साहब बिठूर से पलायन कर गये तो मैनावती यहीं रहगयी। जब अंग्रेज नाना साहब का पता पूछने पहुंचे तो मौके पर 17 वर्षीया मैनावती ही मिली। नाना साहब का पता न बताने परअंग्रेजों ने मैनावती को जिन्दा ही आग में झोंक दिया।
ऐसीही न जाने कितनी दास्तान हैं, जहां वीरांगनाओं ने अपनेसाहस और जीवटता के दम पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये।मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई ने 1857 के संग्राम केदौरान अंग्रेजों का प्रतिकार किया और घिर जाने पर आत्मसमर्पणकरने की बजाय स्वयं को खत्म कर लिया। मध्य प्रदेश में हीजैतपुर की रानी ने अपनी रियासत की स्वतंत्रता की घोषणा करदतिया के क्रांतिकारियों को लेकर अंग्रेजी सेना से मोर्चालिया। तेजपुर की रानी भी इस संग्राम में जैतपुर की रानी कीसहयोगी बनकर लड़ीं। मुजफ्फरनगर के मुंडभर की महावीरी देवी ने 1857 के संग्राम में 22 महिलाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों परहमला किया। अनूप शहर की चौहान रानी ने घोड़े पर सवार होकर हाथोंमें तलवार लिये अंग्रेजों से युद्ध किया और अनूप शहर के थानेपर लगे यूनियन जैक को उतार कर हरा राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया।इतिहास गवाह है कि 1857 की क्रांति के दौरान दिल्ली के आस-पासके गावों की लगभग 255 महिलाओं को मुजफ्फरनगर में गोली से उड़ादिया गया था।
इतिहासगवाह है कि 1905 के बंग-भंग आन्दोलन में पहली बारमहिलाओं ने खुलकर सार्वजनिक रूप से भाग लिया था। स्वामीश्रद्धानन्द की पुत्री वेद कुमारी और आज्ञावती ने इस आन्दोलनके दौरान महिलाओं को संगठित किया और विदेशी कपड़ो की होली जलाई।कालान्तर में 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान वेदकुमारी की पुत्री सत्यवती ने भी सक्रिय भूमिका निभायी। सत्यवतीने 1928 में साइमन कमीशन के दिल्ली आगमन पर काले झण्डों सेउसका विरोध किया था। सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन केदौरान ही अरूणा आसफ अली तेजी से उभरीं और इस दौरान अकेलेदिल्ली से 1600 महिलाओं ने गिरफ्तारी दी।
गांधी इरविनसमझौते के बाद जहां अन्य आन्दोलनकारी नेता जेल सेरिहा कर दिये गये थे वहीं अरूणा आसफ अली को बहुत दबाव पर औरबाद में छोड़ा गया था। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान जब सभीबड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये, तो कलकत्ता के कांग्रेसअधिवेशन की अध्यक्षता एक महिला नेली सेनगुप्त ने की।क्रांतिकारी आन्दोलन में भी महिलाओं ने भागीदारी की। सन् 1912-14 में बिहार में जतरा भगत ने जनजातियों को लेकर टानाआन्दोलन चलाया। उनकी गिरफ्तारी के बाद उसी गांव की महिलादेवमनियां उरांइन ने इस आन्दोलन की बागडोर संभाली। सन् 1931-32 के कोल आन्दोलन में भी आदिवासी महिलाओं ने सक्रिय भूमिकानिभायी थी। स्वाधीनता की लड़ाई में बिरसा मुण्डा के सेनापति-गया मुण्डा की पत्नी माकीबच्चे को गोद में लेकर फरसा-बलुआसे अंग्रेजों से अन्त तक लड़ती रहीं। सन् 1930-32 में मणिपुरमें अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व नागा रानीगुइंदाल्यू ने किया। इनसे भयभीत अंग्रेजों ने इनकी गिरफ्तारीपर पुरस्कार की घोषणा की और कर माफ करने के आश्वासन भी दिये।सन् 1930 में बंगाल में सूर्यसेन के नेतृत्व में हुये चटगांवविद्रोह में युवा महिलाओं ने पहली बार क्रांतिकारी आन्दोलनोंमें स्वयं भाग लिया। ये क्रांतिकारी महिलाएं क्रांतिकारियों कोशरण देने, संदेश पहुंचाने और हथियारों की रक्षा करने से लेकरबन्दूक चलाने तक में माहिर थीं।
इन्हींमें से एक प्रीतीलता वाडेयर ने एक यूरोपीय क्लब पर हमलाकिया और कैद से बचने के लिए आत्महत्या कर ली। कल्पनादत्त कोसूर्यसेन के साथ ही गिरफ्तार कर 1933 में आजीवन कारावास की सजासुनायी गयी और 5 साल के लिये अण्डमान की काल कोठरी में कैद करदिया गया। दिसम्बर 1931 में कोमिल्ला की दो स्कूलीछात्राओं-शान्ति घोष और सुनीति चौधरी ने जिला कलेक्टर कोदिनदहाड़े गोली मार दी और काला पानी की सजा हुई तो 6 फरवरी 1932 को बीना दास ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह मेंउपाधि ग्रहण करने के समय गवर्नर पर बहुत नजदीक से गोली चलाकरअंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। सुहासिनी अली तथा रेणुसेन ने भीअपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से 1930-34 के मध्य बंगाल में धूममचा दी थी।
चन्द्रशेखर आजादके अनुरोध पर दि फिलॉसफी ऑफ बमदस्तावेजतैयार करने वाले क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी दुर्गाभाभीनाम से मशहूर दुर्गा देवी बोहरा ने भगत सिंह को लाहौरजिले से छुड़ाने का प्रयास किया। सन् 1928 में जब अंग्रेज अफसरसाण्डर्स को मारने के बाद भगत सिंह और राजगुरु लाहौर सेकलकत्ता के लिए निकले, तो कोई उन्हें पहचान न सके इसलिए दुर्गाभाभी की सलाह पर एक सुनियोजित रणनीति के तहत भगत सिंह उनकेपति, दुर्गा भाभी उनकी पत्नी और राजगुरु नौकर बनकर वहां सेनिकल लिये। सन् 1927 में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने केलिये लाहौर में बुलायी गई बैठक की अध्यक्षता दुर्गा भाभी नेकी। बैठक में अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जेए स्कॉट को मारने काजिम्मा वे खुद लेना चाहती थीं, पर संगठन ने उन्हें यहजिम्मेदारी नहीं दी। तत्कालीन बम्बई के गर्वनर हेली को मारनेकी योजना में टेलर नामक एक अंग्रेज अफसर घायल हो गया, जिस परगोली दुर्गा भाभी ने ही चलायी थी। इस केस में उनके विरुद्धवारण्ट भी जारी हुआ और दो वर्ष से ज्यादा समय तक फरार रहने केबाद 12 सितम्बर 1931 को दुर्गा भाभी लाहौर में गिरफ्तार कर लीगयीं।
यहसंयोग ही कहा जाएगा कि भगत सिंह और दुर्गा भाभी, दोनों कीजन्म शताब्दी वर्ष 2007 में ही पड़ रही है। क्रांतिकारी आन्दोलनके दौरान सुशीला दीदी ने भी प्रमुख भूमिका निभायी और काकोरीकाण्ड के कैदियों के मुकदमे की पैरवी के लिए अपनी स्वर्गीय माँद्वारा शादी की खातिर रखा 10 तोला सोना उठाकर दान में दिया।यही नहीं उन्होंने क्रांतिकारियों का केस लड़ने के लिएमेवाड़पतिनामक नाटक खेलकर चन्दा भी इकट्ठा किया। सन् 1930 केसविनय अविज्ञा आन्दोलन में इन्दुमतिके छद्म नाम से सुशीलादीदी ने भाग लिया और गिरफ्तार हुयीं। इसी प्रकार हसरत मोहानीको जब जेल की सजा मिली तो उनके कुछ दोस्तों ने जेल की चक्कीपीसने के बजाय उनसे माफी मांगकर छूटने की सलाह दी। इसकीजानकारी जब बेगम हसरत मोहानी को हुई तो उन्होंने पति की जमकरहौसला अफ्ज़ाई की और दोस्तों को नसीहत भी दी। मर्दाना वेष धारणकर उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में खुलकर भाग लिया और बालगंगाधर तिलक के गरम दल में शामिल होने पर गिरफ्तार कर जेल भेजदी गयी, जहां उन्होंने चक्की भी पीसा। यही नहीं महिला मताधिकारको लेकर 1917 में सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में वायसराय सेमिलने गये प्रतिनिधिमण्डल में वह भी शामिल थीं।
सन् 1925 में कानपुर में हुये कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षताकर भारत कोकिलाके नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू को कांग्रेसकी प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ।सरोजिनी नायडू ने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में कईपृष्ठ जोड़े। कमला देवी चट्टोपाध्याय ने 1921 में असहयोगआन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इन्होंने बर्लिंन मेंअन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करतिरंगा झंडा फहराया। सन् 1921 के दौर में अली बन्धुओं की माँबाई अमन ने भी लाहौर से निकल तमाम महत्वपूर्ण नगरों का दौराकिया और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश फैलाया। सितम्बर 1922 में बाई अमन ने शिमला दौरे के समय वहां की फैशनपरस्तमहिलाओं को खादी पहनने की प्रेरणा दी। सन् 1942 के भारत छोड़ोआन्दोलन में भी महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभायी। अरुणा आसफअली और सुचेता कृपलानी ने अन्य आन्दोलनकारियों के साथ भूमिगतहोकर आन्दोलन को आगे बढ़ाया तो ऊषा मेहता ने इस दौर में भूमिगतरहकर कांग्रेस-रेडियो से प्रसारण किया। अरुणा आसफ अली को तो 1942 में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण दैनिक ट्रिब्यूनने ‘1942 की रानी झांसीनाम दिया। अरुणा आसफ अली नमक कानून तोड़ोआन्दोलनके दौरान भी जेल गयीं। सन् 1942 के अन्दोलन के दौरानही दिल्ली में गर्ल गाइडकी 24 लड़कियां अपनी पोशाक पर विदेशीचिन्ह धारण करने और यूनियन जैक फहराने से इनकार करने के कारणअंग्रेजी हुकूमत द्वारा गिरफ्तार हुईं और उनकी बेदर्दी सेपिटाई की गयी। इसी आन्दोलन के दौरान तमलुक की 73 वर्षीया किसानविधवा मातंगिनी हाजरा ने गोली लग जाने के बावजूद राष्ट्रीयध्वज को अन्त तक ऊंचा उठाए रखा।
महिलाओंने परोक्ष रूप से भी स्वतंत्रता संघर्ष में प्रभावीभूमिका निभा रहे लोगों को काफी सराहा। सरदार वल्लभ भाई पटेल कोसरदारकी उपाधि बारदोली सत्याग्रह के दौरान वहां की महिलाओंने ही दी। महात्मा गांधी को स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उनकीपत्नी कस्तूरबा गांधी ने पूरा समर्थन दिया। उनकी नियमित सेवाऔर अनुशासन के कारण ही महात्मा गांधी आजीवन अपने लम्बे उपवासोंऔर विदेशी चिकित्सा के पूर्ण निषेध के बावजूद स्वस्थ रहे। अपनेव्यक्तिगत हितों को उन्होंने राष्ट्र की खातिर तिलांजलि दे दी।भारत छोड़ो आन्दोलन प्रस्ताव पारित होने के बाद महात्मा गांधीको आगा खां पैलेस (पूना) में कैद कर लिया गया। कस्तूरबा गांधीभी उनके साथ जेल गयीं। डॉ सुशीला नैयर, जो कि गांधीजी की निजीडाक्टर भी थीं और भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 1942-44 तकमहात्मा गांधी के साथ जेल में रहीं।
इन्दिरागांधी ने 6 अप्रैल 1930 को बच्चों को लेकर वानर सेनाका गठन किया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपना अद्भुतयोगदान दिया। यह सेना स्वतंत्रता सेनानियों को सूचना देने औरसूचना लेने का कार्य करती और हर प्रकार से उनकी मदद करती थी।विजयलक्ष्मी पण्डित भी गांधीजी से प्रभावित होकर जंग-ए-आजादीमें कूद पड़ीं। वह हर आन्दोलन में आगे रहतीं, जेल जातीं, रिहाहोतीं, और फिर आन्दोलन में जुट जातीं। सन् 1945 में संयुक्तराष्ट्र संघ के सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में विजयलक्ष्मीपण्डित ने भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। सुभाषचन्द्र बोस की 'आरजी हुकूमते आजाद हिन्द सरकार' में महिला विभाग की मंत्री औरआजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेण्ट की कमाण्डिंग ऑफिसररहीं कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने आजादी में प्रमुख भूमिका निभायी।सुभाष चन्द्र बोस के आह्वान पर उन्होंने सरकारी डॉक्टर कीनौकरी छोड़ दी। कैप्टन सहगल के साथ आजाद हिन्द फौज की रानीझांसी रेजीमेण्ट में लेफ्टिनेण्ट रहीं लेफ्टिनेंट मानवती आर्याने भी सक्रिय भूमिका निभायी। अभी भी ये दोनों सेनानी कानपुरमें तमाम रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय हैं।
भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलनकी गूंज भारत के बाहर भी सुनायी दी।विदेशों में रह रही तमाम महिलाओं ने भारतीय संस्कृति सेप्रभावित होकर भारत और अन्य देशों में स्वतंत्रता आन्दोलन कीअलख जगायी। लन्दन में जन्मीं एनीबेसेन्ट ने न्यू इण्डियाऔरकामन वीलपत्रों का सम्पादन करते हुये आयरलैण्ड के स्वराज्यलीगकी तर्ज पर सितम्बर 1916 में भारतीय स्वराज्य लीग’ (होमरूल लीग) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य स्वशासन स्थापितकरना था। एनीबेसेन्ट को कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष होनेका गौरव भी प्राप्त है। एनीबेसेन्ट ने ही 1898 में बनारस मेंसेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज की नींव रखी, जिसे 1916 में महामनामदनमोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप मेंविकसित किया। भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक मैडम भीकाजी कामाने लन्दन, जर्मनी और अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रताके पक्ष में माहौल बनाया। उनका पेरिस से प्रकाशितवन्देमातरम्पत्र प्रवासी भारतीयों में काफी लोकप्रिय हुआ।
सन् 1909में जर्मनी के स्टटगार्ट में हुयी अन्तर्राष्ट्रीयसोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम भीकाजी कामा ने प्रस्ताव रखा कि- 'भारत में ब्रिटिश शासन जारी रहना मानवता के नाम पर कलंक है।एक महान देश भारत के हितों को इससे भारी क्षति पहुंच रही है।' उन्होंने लोगों से भारत को दासता से मुक्ति दिलाने में सहयोगकी अपील की और भारतवासियों का आह्वान किया कि- 'आगे बढ़ो, हमहिन्दुस्तानी हैं और हिन्दुस्तान हिन्दुस्तानियों का है।' यहीनहीं मैडम भीकाजी कामा ने इस कांफ्रेंस में वन्देमातरम्अंकित भारतीय ध्वज फहरा कर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। मैडमभीकाजी कामा लन्दन में दादाभाई नौरोजी की प्राइवेट सेक्रेटरीभी रहीं। आयरलैंड की मूल निवासी और स्वामी विवेकानन्द कीशिष्या मारग्रेट नोबुल (भगिनी निवेदिता) ने भी भारतीयस्वतंत्रता संग्राम में तमाम मौकों पर अपनी सक्रियता दिखायी।

 

कलकत्ता विश्वविद्यालयमें 11 फरवरी 1905 को आयोजित दीक्षान्तसमारोह में वायसराय लार्ड कर्जन के भारतीय युवकों के प्रतिअपमानजनक शब्दों का उपयोग करने पर भगिनी निवेदिता ने खड़े होकरनिर्भीकता के साथ प्रतिकार किया। इंग्लैण्ड के ब्रिटिश नौसेनाके एडमिरल की पुत्री मैडेलिन ने भी गांधीजी से प्रभावित होकरभारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। मीरा बहनके नाम से मशहूरमैडेलिन भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान महात्मा गांधी के साथ आगाखां महल में कैद रहीं। मीरा बहन ने अमेरिका और ब्रिटेन मेंभारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया। मीरा बहन केसाथ-साथ ब्रिटिश महिला म्यूरियल लिस्टर भी गांधीजी से प्रभावितहोकर भारत आयीं और अपने देश इंग्लैण्ड में भारत की स्वतंत्रताके पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया। द्वितीय गोलमेजकांफ्रेन्स के दौरान गांधीजी इंग्लैण्ड में म्यूरियल लिस्टर केकिंग्सवे हॉलमें ही ठहरे थे। इस दौरान म्यूरियल लिस्टर नेगांधीजी के सम्मान में एक भव्य समारोह भी आयोजित किया था। इनवीरांगनाओं के अनन्य राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस, अटूटप्रतिबद्धता और उनमें से कईयों का गौरवमयी बलिदान भारतीयइतिहास की एक जीवन्त दास्तां है। यह पक्का हो सकता है उनमें सेकईयों को इतिहास ने विस्मृत कर दिया हो, पर लोक चेतना में वेअभी भी मौजूद हैं।जय हिंद!

 

  

 

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