शेरो-शायरी

अपने जज्बात को,

 

नाहक ही सजा देती हूँ

 

होते ही शाम,

 

चरागों को बुझा देती हूँ

 

जब राहत का,

 

मिलता ना बहाना कोई

 

लिखती हूँ हथेली पे नाम तेरा,

 

लिख के मिटा देती हूँ..

 

ना पूछ मेरे सब्र की इंतहा कहाँ तक है, तू सितम कर ले, तेरी हसरत जहाँ तक है,

 

वफ़ा की उम्मीद, जिन्हें होगी उन्हें होगी, हमें तो देखना है, तू बेवफ़ा कहाँ तक है ॥

 

 

 

***********************

 

प्यार  कमजोर  दिल  से  किया  नहीं  जा  सकता ,

 

ज़हर  दुश्मन  से  लिया  नहीं  जा  सकता,

 

दिल  में  बसी  है  उल्फत  जिस  प्यार  की

 

उस  के  बिना  जिया  नहीं  जा  सकता.

 

Thursday the 18th. Affiliate Marketing. © janjgirlive.com
Copyright 2012

©