किशोरावस्थासे ही राष्ट्राभिमानी वृत्तिके नेताजी सुभाषचंद्र बोस !

१. भविष्यमें महान कार्य करनेकी दृष्टिसे कष्टमय
जीवनयापनका अभ्यास करनेवाले सुभाषचंद्र बोस !

         एक बार शरद ऋतुमें मूसलाधार वर्षा हो रही थी । आधी रातमें मां प्रभावतीदेवी की नींद खुली, तो उन्हें सुभाषकी चिंता होने लगी । उन्होंने सुभाषके कक्षमें जाकर देखा, तो किशोर सुभाष पलंग छोडकर भूमिपर दरी बिछा कर सो रहा था । यह देखकर उन्हें बडा दुःख हुआ । उन्होंने सुभाषको जगाया और उन दोनोमें आगेका संभाषण हुआ ।

मां : बेटा, तुम भूमि पर क्यों सो रहे हो ? इससे तो ठंड लगकर बीमार पड जाओगे । 

सुभाष :
मां, मैं कष्ट सहनेका अभ्यास कर रहा हूं । मुझे बडा होकर बडा कार्य करना है ।

मां : बेटा, बडा काम करने के लिए भूमिपर सोना एवं कष्ट सहना आवश्यक है क्या ?

सुभाष :
हां मां, सुख-सुविधामें जीनेवाले बडे काम नहीं कर सकते । (तुमतो जानती हो) कि हमारे ऋषि-मुनि वनोंमें आश्रम बनाकर रहते थे तथा भूमिपर सोते थे । इसलिए वे महान ग्रंथोंकी रचना कर सके । राम एवं कृष्णके विषयमें आपने बताया ही है कि वे विश्वामित्र एवं सांदीपनी ऋषियोंके आश्रमोंमें कठोरतासे जीवन-यापन किया करते थे ।


२. भारतको दास्यतासे  मुक्त करने हेतु प्राणोंको न्योछावर
करनेकी सिध्दता रखनेवाला बालक सुभाष (सुभाषचंद्र बोस) !         

         सुभाष बाबूके जीवनपर विद्यालयके प्रधानाचार्य श्री बेनीप्रसाद माधवका बडा प्रभाव पडा । वे ११ वर्षकी अवस्थामें विद्यालयके अत्यंत उदार तथा सच्चे देशभक्त गुरु श्री बेनीप्रसादके संपर्कमें आए । स्वयं बेनीप्रसाद माधव बालक सुभाष की कुशाग्र बुदि्ध तथा परिश्रमी वृत्तिसे बहुत प्रभावित थे । उन्होंने सुभाषसे कहा—‘तुम जब कुछ पूछना चाहो, तो मेरे पास किसी भी समय निःसंकोच आ सकते हो ।' सुभाष तो यही चाहते थे; क्योंकि उनके मनमें समाजकी दुरवस्थाके विषयमें अनेक प्रश्न उठते थे । साथियोंसे प्रश्न करने पर उचित समाधान नहीं हो पाता था । एक दिन सुभाषजी और उनके प्रधानाचार्यजी आगेका संवाद हुआ । 

सुभाष : ‘बाबूजी, हम अंगेंरजोंके दास क्यों है ? क्या हम सदासे इनके दास रहे हैं और इसी प्रकार सदाके लिए दास बने रहेंगे ? 

बाबूजी :
‘बेटा, भारत सदासे ऐसा नहीं है । हम तो संसारमें सबसे पराक्रमी और महान थे । हमारे देशमें इतना धन होता था कि दूसरे देशोंके लोग इसे सोनेकी चिडिया कहते थे । रोम,चीन,जापान आदि देशोंके लोग यहां ज्ञान प्राप्त करने आया करते थे । हमारा भारत देश प्राचीन कालमें विश्वगुरु कहलाता था। 

सुभाष :
फिर हमारा देश पराधीन क्यों हुआ ? 

बाबूजी :
हमारी आपसी फूट के कारण । दुष्ट विदेशियोंने हमारी सरलता और फूटका लाभ उठाकर हमपर अपना राज्य स्थापित कर लिया । 

सुभाष :
बाबूजी मैं इन दासताकी कडियोंको काटकर फेक देना चाहता हूं । 

बाबूजी :
विचार तो श्रेष्ठ है सुभाष, लेकिन अभी तुम्हारी अवस्था बहुत छोटी है । पहले पढ-लिखकर बडे तथा योग्य बन जाओ, फिर यह प्रयास अवश्य करना ।

सुभाष :
बाबूजी, मैं भारतमाताको पराधीनतासे मुक्त कराने के लिए प्राणोंकी बाजी तक लगा सकता हूं । तबसे सुभाष अनेक रातें देशको अंग्रेजोंकी दासतासे मुक्त कराने के उपाय सोचनेमें व्यतीत करने लगे । उन्होंने इतिहास तथा संस्कृतका अध्ययन किया तथा अनेक संस्कृत सुभाषित कंठस्थ किए । आगे, उनके गुरु, बाबूजीकी प्रेरणाने उन्हें बालक सुभाषसे भारतका गौरव पुरुष- नेताजी सुभाष चंद्र बोस बना दिया ।

संदर्भ : ’गीता स्वाध्याय’, जनवरी २०११

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