शहीद-ए-आजम भगत सिंह

देश पर अपनी जान न्यौछावर करदेने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने अपनी मां की ममता से ज्यादा तवज्जो भारतमां के प्रति अपने प्रेम को दी थी।

कहाजाता है कि भगत सिंह को फांसी की सजा की आशंका के चलते उनकी मां विद्यावतीने उनके जीवन की रक्षा के लिए एक गुरुद्वारे में अखंड पाठ कराया था। इस परपाठ करने वाले ग्रंथी ने प्रार्थना करते हुए कहा, ‘गुरु साहब... मां चाहतीहै कि उसके बेटे कीजिन्दगी बच जाए, लेकिन बेटा देश के लिए कुर्बान होजाना चाहता है। मैंने दोनों पक्ष आपके सामने रख दिए हैं जो ठीक लगे, मानलेना।

शहीद-ए-आजमके पौत्र (भतीजे बाबर सिंह संधु के पुत्र) यादविंदर सिंह ने परिवार केबड़े सदस्यों के संस्मरणों के आधार परबताया कि विद्यावती जब भगत सिंह केजीवन की रक्षा के लिए अरदास करने गुरुद्वारे गईं तो भगत सिंह ने उनसे कहाथा कि वह देशपर बलिदान हो जाने की अपने बेटे की ख्वाहिश का सम्मान करें।

उन्होंनेकहा कि जब विद्यावती भगत सिंह से मिलने जेल पहुंचीं, तो शहीद-ए-आजम नेउनसे पूछा कि ग्रंथी ने क्या कहा? इस परमां ने सारी बात बताई और भगत सिंहने इसके जवाब में कहा, ‘मां आपके गुरु साहिबान भी यही चाहते हैं कि मैंदेश पर कुर्बान होजाऊं क्योंकि इससे बड़ा कोई और पुण्य नहीं है। देश केलिए मर जाना आपकी ममता से कहीं बड़ा है।

 

 

 

यादविंदर ने बताया कि भगतसिंह चाहते थे कि जब उन्हें फांसी हो तो उनकी पार्थिव देह उनका छोटा भाईकुलबीर घर ले जाए औरउनकी मां उस समय जेल में हरगिज नहीं आएं। हालांकि, भगत सिंह की यह चाहत पूरी नहीं हो सकी, क्योंकि अंग्रेजों ने उन्हें तयवक्त से एक दिन पहले ही फांसी पर लटका दिया और टुकड़े-टुकड़े कर उनके शव कोसतलुज नदी के किनारे जला दिया।

उनकेअनुसार भगत सिंह ने अपनी मां से कहा था, ‘मां मेरा शव लेने आप नहीं आना औरकुलबीर को भेज देना, क्योंकि यदि आप आएंगी तो आप रो पड़ेंगी और मैं नहींचाहता कि लोग यह कहें कि भगत सिंह की मां रो रही है।

पंजाब के लायलपुर जिले (वर्तमान में पाकिस्तान का फैसलाबाद) के बांगा गांव में 27 सितंबर 1907 को जन्मे शहीद-ए-आजभगतसिंह जेल में मिलने के लिए आने वाली अपनी मां से अक्सर कहा करते थे कि वहरोएं नहीं, क्योंकि इससे देश के लिए उनके बेटे द्वारा किए जा रहे बलिदान कामहत्व कम होगा।

परिवारके अनुसार, शहीद ए आजम का नाम भागां वाला’ (किस्मत वाला) होने के कारणभगत सिंह पड़ा। उन्हें यह नाम उनकीदादी जयकौर ने दिया था, क्योंकि जिसदिन उनका जन्म हुआ उसी दिन उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह जेल सेछूट कर आए थे।

करतारसिंह सराबा को अपना आदर्श मानने वाले भगत सिंह की जिन्दगी में 13 और 23 तारीख का बहुत बड़ा महत्व रहा। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग नरसंहारने उन्हें क्रांतिकारी बनाने का काम किया।

उनकेपरिवार के सदस्यों के मुताबिक भगत सिंह द्वारा लिखे गए ज्यादातर पत्रों पर 13 या 23 तारीख अंकित है। 23 मार्च 1931 को 23 साल की उम्र में वह देश केलिए फांसी के फंदे पर झूल गए। (भाषा)

 

 

 

 

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